जब आप भगवान को अपना बना लेंगे तो कभी आपकी पराजय नहीं होगी __ राजयोगिनी बी के कंचन दीदी

भगवानकपुर संवाददाता विजय भारती की रिपोर्ट

भगवानपुर (बेगूसराय) दुखों का कारण अपने आपको भूल जाना है।इस संसार में धर्म पिताएं अनेक हैं, गुरु अनेक हैं, महान् आत्माएं अनेक हैं लेकिन परमपिता एक हैं।हम उनके संतान हैं।इसकी विस्मृति ही दुःख का कारण है। मैं अजन्मा,जन्म मरण से पड़े, कल्याणकारी परमात्मा शिव की संतान हैं। इसे जानना आवश्यक है उक्त उद्गार प्रखंड क्षेत्र के अतरूआ गांव स्थित ब्रह्म स्थान में आयोजित तीन दिवसीय शिव महिमा सह शिव अवतरण महोत्सव के दौरान ज्ञान कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय बेगूसराय सेवा केन्द्र के संचालिका पूज्यनीया राजयोगिनी बी के कंचन दीदी ने व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि हमारे सनातन धर्म में तेंतीस कोटि देवी देवता हैं जो सभी सकार रुप में हैं, लेकिन भगवान शिव का रुप लिंग के रूप में है जिन्हें हम पुजते हैं।वे निरंकार है,वे सत्यम शिवम् सुंदरम हैं।जिस परमात्मा से प्रित जोड़ने हैं उसे जानना जरूरी है।उसका परिचय जानना आवश्यक है।आत्मा और परमात्मा का रिस्ता अविनाशी है लेकिन शरीर की रिस्तेदारी विनाशी है। कितना भी प्रिय व्यक्ति हो , लेकिन आत्मा निकल जाने से उसे एक पल भी अपने पास नहीं रखना चाहते हैं।

शरीर में रोग है तो डाक्टर और बैद्य इलाज करते हैं, लेकिन मन रोगग्रस्त हो जाय तो परमात्मा के शिवा किसी के पास इलाज नहीं होता।लोग दूसरे के सुख से दुखी है यह कांटे जैसे संस्कार को फूल जैसा बनना है। भगवान को फूल चढ़ाने से ही भगवान प्रसन्न नहीं होते बल्कि अपने जीवन को फूलों जैसे बनाने से भगवान प्रसन्न होते हैं। आज़ मनुष्य का आचरण पशु तुल्य हो गया है।

शिव बाबा बिन्दु स्वरुप हैं और कालों के काल महाकाल हैं। आत्मा जहां मां बहन बिन्दी लगाते हैं वहीं निवास करती है। अहंकार छोड़ने से भगवान से मिलन होता है।हम शरीर के पिता हैं लेकिन आत्मा के पिता परमात्मा है। आज़ के यजमान रामाकांत मिश्र तथा सूरंजना देवी ने दीदी को गुलदस्ता दे कर, चुनरी ओढ़कर तथा माथे में टीका लगाकर तथा माल्यार्पण कर सम्मानित किया। उक्त अवसर गुरुवार को श्रोताओं की अच्छी भीड़ देखी गई।