आरोपी को बचाने के लिए थानाध्यक्ष और केस आई०ओ ने रची नई गाथा।
कब तक ऐसे महान थानेदार के भरोसे रहेंगे क्षेत्र की जनता, पता नहीं कौन से निर्दोष को आरोपी को छोड़ने के एवज में भोगना पड़ेगा सजा।
बेगूसराय :- बिहार पुलिस और विवादों में ना रहें ये हो नहीं सकता , जी हां बिहार के बेगूसराय से एक बड़ी खबर सामने आई है , मामला है बिना एफआईआर में नाम रहते हुए आरोपी बनाकर जेल भेजने का। घटना जिलें के फुलवड़िया थाना की बताई जा रही है जहां नवीन कुमार फुलवड़िया थानाध्यक्ष के द्वारा कांड संख्या 50/22 में मधुरापुर निवासी कारी सिंह पिता किसनंदन सिंह को जेल भेजने को लेकर फुलवड़िया थानाध्यक्ष घिरते हुए दिख रहें हैं।

आरोप लग रहा है कि जहां 50/22 कांड के आरोपी कारी सिंह पे० सुरेश सिंह को छोड़ने के लिए सारे हथकंडे अपनाए गए। सूत्र बताते हैं कि कारी सिंह पे० सुरेश सिंह निपनिया निवासी कई कांडों में आरोपी है । जब गिरफ्तारी हुई तो जेल भेजना ही होगा तब थानाध्यक्ष के द्वारा नई योजना बनाई गई।

और थाना कांड संख्या 50/22 में कारी सिंह पे० कृष्नंदन को नाम बदल कर कारी सिंह पे० सुरेश सिंह बनाकर न्यायिक अभिरक्षा में बेगूसराय मंडलकारा भेज दिया गया। ये खुलासा तब हुआ जब कारी सिंह पे० किसनंदन सिंह साकिन मधुरापुर के विद्वान अधिवक्ता चंद्रभूषण कुमार के द्धारा माननीय न्यायालय में आवेदन देकर अपनें मुवक्किल को छोड़ने की गुहार लगाई गई।

तब बातें सामने आईं जिसे फुलवड़िया थानाध्यक्ष के द्वारा न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया वो तो उस कांड का आरोपी है ही नहीं। तब फिर थानाध्यक्ष और केस आई०ओ० के द्वारा नई पैंतरा अपनाई गई और कारी सिंह पे० किसनंदन सिंह के नाम में पिता सुरेश सिंह उर्फ में किसनंदन सिंह कर दिया गया।

अब सोचनीय सवाल कि न्यायिक अभिरक्षा से बाहर आने की प्रक्रिया में आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, राशनकार्ड, पेन कार्ड, इत्यादि कागजों की बहुत ही सख्त जरूरत होती है। अब कारी सिंह पे० किसनंदन सिंह को पुलिस के गलती कहें या नासमझी, या हम ये भी कह सकते हैं छनिक लाभ के लिए किसी भी व्यक्ति को नाम बदलकर कांडों में जेल भेजने से उसके परिजनों को जमानत करवाने में कौन – कौन से मुसीबत का सामना करना पड़ेगा।

पुलिस की गलती की सजा बिना कांड के आरोपी को कब तक मिलते रहेंगी। देखा जाए तो किसी भी व्यक्ति को न्यायिक अभिरक्षा में भेजने से पहले पूरी तरह जांच पड़ताल करके सत्यापित होने के बाद न्यायिक अभिरक्षा में भेजा जाता है, तब इतनी बड़ी चूक आखिर कैसे हुई खबर में एफआईआर का कांपी भी देख सकतें हैं कि बिहार के जवाबदेह पुलिस अपने दायित्व कैसे निर्वाहन करतें।

हम ये कह सकते हैं कि ( अजब पुलिस तेरी गजब दास्तां बिना एफआईआर में नाम रहने के बाद भी मंडल कारा भेजकर देते हैं सजा)। इस मामले में जब फुलवड़िया थानाध्यक्ष से बात करनें की कोशिश हुआ तब बहाने बना कर बचते दिखे। जो भी हो फुलवड़िया थानाध्यक्ष के इस घटना ने क्षेत्र में सुर्खियों में बिहार पुलिस को अवश्य ला दिए हैं।

बुद्धिजीवी वर्ग बताते हैं कि पता नहीं ऐसे पदाधिकारी के अब कौन – कौन से व्यक्ति शिकार होंगे। जहां आरोपी को छोड़ने के लिए किसी को भी मंडल कारा के दर्शन करनें होंगे। देखना दिलचस्प तो होता है कि ऐसे लापरवाही पदाधिकारी पर वरीय अधिकारी के द्धारा क्या कार्रवाई की जाती है।

